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विधा गीत
विषय गुनगुनी धूप
🌹🌹🌹🌹🌹
गुनगुनी धूप धीरे से कह गयी
जागो उठो पहचानो अपने वजूद को
देकर उमंग उजास मेरा दामन
वो भर गयी।
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
उलझनों मे गम की, उलझा हुआँ था मै
संकल्प भर हृदय में पथ मुझको
दिखा गयी।
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
किरणें न ई ऊषा की पुकारतीअधीर है
जागों उठों मायूसियों के दामन को छोड़ के।
हृदय में चेतना उमंग, जोशभर गयी
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
अवसाद दर्द से, था आहत मेरा हृदय
गैरों की क्या कहें, जख्म अपनो ने थे दिये।
सहला मेरे जख्मों को मरहम लगा गयी
गुनगुनी धूप धीरे से कह गयी
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
मन्शा शुक्ला
अम्बिकापुर
सुनिए नए ज़माने की नयी कवितायें
कलम से एक व्हात्सप्प ग्रुप का संयोजन है जिसमें कई नामी गिरामी कवि और लेखक हैं, यह पॉडकास्ट उनके लेखन की प्रक्रिया और उनकी रचनाओं को आम जनों तक लाने का तुच्छ सा प्रयास है। आइये सुनते
हैं| अपनी प्रतिक्रियाओं से नवाजें। धन्यवाद।।
और कवितायें पढ़ने के लिए हमारे फ़ेसबुक पेज पर जाएँ....
https://www.facebook.com/rachnaayeaapkikalamse/
विषय गुनगुनी धूप
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गुनगुनी धूप धीरे से कह गयी
जागो उठो पहचानो अपने वजूद को
देकर उमंग उजास मेरा दामन
वो भर गयी।
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
उलझनों मे गम की, उलझा हुआँ था मै
संकल्प भर हृदय में पथ मुझको
दिखा गयी।
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
किरणें न ई ऊषा की पुकारतीअधीर है
जागों उठों मायूसियों के दामन को छोड़ के।
हृदय में चेतना उमंग, जोशभर गयी
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
अवसाद दर्द से, था आहत मेरा हृदय
गैरों की क्या कहें, जख्म अपनो ने थे दिये।
सहला मेरे जख्मों को मरहम लगा गयी
गुनगुनी धूप धीरे से कह गयी
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।
मन्शा शुक्ला
अम्बिकापुर
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