कलम से
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Kalam se
कलम से - ऑनलाइन कवि सम्मेलन- मन्शा शुक्ला की कविता उन्ही की जुबानी
2 minutes Posted Apr 21, 2020 at 3:03 pm.
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विधा गीत
विषय गुनगुनी धूप
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गुनगुनी धूप धीरे से कह गयी
जागो उठो पहचानो अपने वजूद को
देकर उमंग उजास मेरा दामन
वो भर गयी।
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

उलझनों मे गम की, उलझा हुआँ था मै
संकल्प भर हृदय में पथ मुझको
दिखा गयी।
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

किरणें न ई ऊषा की पुकारतीअधीर है
जागों उठों मायूसियों के दामन को छोड़ के।
हृदय में चेतना उमंग, जोशभर गयी
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

अवसाद दर्द से, था आहत मेरा हृदय
गैरों की क्या कहें, जख्म अपनो ने थे दिये।
सहला मेरे जख्मों को मरहम लगा गयी
गुनगुनी धूप धीरे से कह गयी
गुनगुनी धूप,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

मन्शा शुक्ला
अम्बिकापुर


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