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z### यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण ###
हमें पता है तुम्हें पता है पता सभी को है इतना।
यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण पाप बड़ा तरु-वन कटना।।
अनावृष्टि अतिवृष्टि कभी तो कभी धरित्री का कंपन ।
कितने दे संकेत प्रकृति औ कितना दिखलाए दर्पण ।।
पर्यावरण सुरक्षा पर गंभीर नहीं यदि हम होंगे।
अभिशाप प्रकृति का भोगेंगे हम रोग ग्रस्त अंधे- गूंगे ।।
यह सुसभ्य उन्नत समाज यह और करेगा अति कितना।।1।।
यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण ,पाप बड़ा तरु- वन कटना।।
सुरभित सुखद पवन रह जाये ना केवल सपना बनकर ।
हो जाएँ ना दुष्कर साँसें, भर जाए विष कण कण पर ।।
सुख विलास वैभव यह कैसा यह कैसी है भौतिकता ।
'सांसो की कीमत पर जीवन' यह कैसी है आधुनिकता।
गिरि ,वन, सरि,सर,निर्झर, सागर सब विषाक्त होते जाते।
रसा , रसातल ,अंबर,पशु, खग रोते,पर हम मदमाते ।।
उत्पादकता लुप्त हो रही लुप्त हो रहा जल अपना ।।2।।
यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण पाप बड़ा तरु-वन कटना ।।
चलो करें संकल्प आज कुछ पर्यावरण बचाने को ।
करके दिखलाएंगे, प्रेरित करेंगे वृक्ष लगाने को।
प्रकृति की लय में जीवन जीने, का अभ्यास करेंगे हम ।
बहुत हो चुकी लापरवाही अब कुछ खास करेंगे हम।
रखेंगे निज परिवेश स्वच्छ शुचि जल भोजन लेंगे सात्विक।
नहीं प्रकृति का ह्रास करेंगे,करेंगे जीवन परिमार्जित ।।
पर्यावरण प्रदूषण का अब बहुत जरूरी है रुकना ।।3।।
यज्ञ सरिस वृक्षारोपण पाप बड़ा तरु-वन कटना ।।
कलम से
कृष्ण मोहन निगम
(सीतापुर)सरगुजा
सुनिए नए ज़माने की नयी कवितायें
कलम से एक व्हात्सप्प ग्रुप का संयोजन है जिसमें कई नामी गिरामी कवि और लेखक हैं, यह पॉडकास्ट उनके लेखन की प्रक्रिया और उनकी रचनाओं को आम जनों तक लाने का तुच्छ सा प्रयास है। आइये सुनते
हैं| अपनी प्रतिक्रियाओं से नवाजें। धन्यवाद।।
और कवितायें पढ़ने के लिए हमारे फ़ेसबुक पेज पर जाएँ....
https://www.facebook.com/rachnaayeaapkikalamse/
हमें पता है तुम्हें पता है पता सभी को है इतना।
यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण पाप बड़ा तरु-वन कटना।।
अनावृष्टि अतिवृष्टि कभी तो कभी धरित्री का कंपन ।
कितने दे संकेत प्रकृति औ कितना दिखलाए दर्पण ।।
पर्यावरण सुरक्षा पर गंभीर नहीं यदि हम होंगे।
अभिशाप प्रकृति का भोगेंगे हम रोग ग्रस्त अंधे- गूंगे ।।
यह सुसभ्य उन्नत समाज यह और करेगा अति कितना।।1।।
यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण ,पाप बड़ा तरु- वन कटना।।
सुरभित सुखद पवन रह जाये ना केवल सपना बनकर ।
हो जाएँ ना दुष्कर साँसें, भर जाए विष कण कण पर ।।
सुख विलास वैभव यह कैसा यह कैसी है भौतिकता ।
'सांसो की कीमत पर जीवन' यह कैसी है आधुनिकता।
गिरि ,वन, सरि,सर,निर्झर, सागर सब विषाक्त होते जाते।
रसा , रसातल ,अंबर,पशु, खग रोते,पर हम मदमाते ।।
उत्पादकता लुप्त हो रही लुप्त हो रहा जल अपना ।।2।।
यज्ञ सरिस शुभ वृक्षारोपण पाप बड़ा तरु-वन कटना ।।
चलो करें संकल्प आज कुछ पर्यावरण बचाने को ।
करके दिखलाएंगे, प्रेरित करेंगे वृक्ष लगाने को।
प्रकृति की लय में जीवन जीने, का अभ्यास करेंगे हम ।
बहुत हो चुकी लापरवाही अब कुछ खास करेंगे हम।
रखेंगे निज परिवेश स्वच्छ शुचि जल भोजन लेंगे सात्विक।
नहीं प्रकृति का ह्रास करेंगे,करेंगे जीवन परिमार्जित ।।
पर्यावरण प्रदूषण का अब बहुत जरूरी है रुकना ।।3।।
यज्ञ सरिस वृक्षारोपण पाप बड़ा तरु-वन कटना ।।
कलम से
कृष्ण मोहन निगम
(सीतापुर)सरगुजा
सुनिए नए ज़माने की नयी कवितायें
कलम से एक व्हात्सप्प ग्रुप का संयोजन है जिसमें कई नामी गिरामी कवि और लेखक हैं, यह पॉडकास्ट उनके लेखन की प्रक्रिया और उनकी रचनाओं को आम जनों तक लाने का तुच्छ सा प्रयास है। आइये सुनते
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