कलम से
कलम से
Kalam se
कलम से - ऑनलाइन कवि सम्मेलन- अर्चना पाठक निरंतर की कविता उन्ही की जुबानी
4 minutes Posted Apr 21, 2020 at 3:00 pm.
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गीत

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पहले पाती प्रेम की
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मौन ही करती रही,
मौन से संवाद।
दिल बहुत व्याकुल हुआ,
और घिर गया अवसाद।

बिन तुम्हारे रह न पाऊँ,
कह रही मैं तुमसे आज
चाँद भी अब मुँह चिढा़ये,
आ रही है मुझको लाज।


छेड़ कर झंकार तुम
दे गये इक याद
मौन ही करती रही
मौन से संवाद।
दिल बहुत....

हाथों में मिल गये हाथ
और नैन हैं अभिराम ।
भीगती पलकें झुकी
फिर नहीं विश्राम ।

मूक भी वाचाल है
दिल हुआ आबाद।
मौन ही करती रही
मौन से संवाद
दिल बहुत.....

विस्मृत पटल पे खींचती
उष्ण सी कलियाँ उदास।
सो रही सुर गामिनी
भर के ले श्वासों में श्वास।

निश्छला हूँ मुझसे मिल
यूँ न कर मुझको आजाद।
मौन ही करती रही
मौन से संवाद
दिल बहुत...

पलकों पे अश्रु टिके कुछ
कुछ लुढ़कते ही रहे ।
भाल उर स्वर वेदना के
रूद्ध क्रुद्ध क्रंदित हुए।

झील चक्षु हैं ये खारे
रिस रहे हैं बन मवाद।
मौन ही करती रही
दिल...

अर्चना पाठक निरंतर
अम्बिकापुर

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