कलम से
कलम से
Kalam se
कलम से - ऑनलाइन कवि सम्मेलन- डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक" की कविता उन्ही की जुबानी
3 minutes Posted Apr 19, 2020 at 4:18 pm.
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दी और जल

तुम हो कल-कल करती नदिया,मैं हूँ तुझमें बहता जल,
तेरे मन के आश्रय से ही , उन्नत होगा मेरा कल।

तुम हो चञ्चल बहती धारा,
मैं बसता हूँ तेरे अन्तर,
लहरा के बल खाके बहना
मुझको लिए हृदय के अन्दर।

साथ चले हैं सतत चिरन्तन, मिले रुकावट या अरिदल,
तुम हो कल-कल करती नदिया,मैं हूँ तुझमें बहता जल।

डगर तेरी पर्वत घाटी है
पर संग - संग मैं भी चलता हूँ,
ऊबड़ - खाबड़ सब रास्तों पर
चोट सभी संग - संग सहता हूँ।

जब तक है अस्तित्व हमारा , साथ रहेंगे हम प्रतिपल,
तुम हो कल-कल करती नदिया , मैं हूँ तुझमें बहता जल।

न तुम अपना पथ छोड़ोगी
न ही मेरा संग छूटेगा,
शाश्वत प्रेम हमारा हमदम
कभी न ये बन्धन टूटेगा।

पाकर प्रिये ! तरंगिनि का संग , मैं भी हो जाता हूँ निर्मल,
तुम हो कल - कल करती नदिया , मैं हूँ तुझमें बहता जल।

जलधि मेरा ही बृहद रूप है
जिससे तुम मिलने को आतुर,
ज्यों बारिश के लिए तड़पता
हिय में प्यास लिये दादुर।

वर्षों की चाहत पूरी हो , खिल जाएगा अन्तस्तल,
तुम हो कल - कल करती नदिया , मैं हूँ तुझमें बहता जल।

तुम मेरी चिर - संगिनि तटिनी
"भावुक" तेरा प्रिय समन्दर,
लहर - लहर लहरा के आना
मेरे अन्तर्मन के अन्दर।

सदियों से कर रहे प्रतीक्षा,कर दो शान्त हृदय की हलचल,
तुम हो कल - कल करती नदिया , मैं हूँ तुझमें बहता जल।

तेरे मन के आश्रय से ही , उन्नत होगा मेरा कल...

डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"




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