कलम से
कलम से
Kalam se
कलम से - ऑनलाइन कवि सम्मेलन- सविता बरई'वीणा' की कविता उन्ही की जुबानी
2 minutes Posted Apr 19, 2020 at 3:26 pm.
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गुमराह

गुमराह होकर गया जब से वो,
लौट कर न आया तब से वो।

इसी राह बालपन था गुजरा,
क्यों हुआ फिर गुमनाम वो।

कोकिला कूके उपवन में,
सांझ तक भी आया न वो।

ज़मीं पर है,या आसमां पर,
खुदा जाने हैं,कहां पर वो।

आया पतझड़ गया सावन,
तपती दोपहरी कि छांव वो।

झोपड़ी से महल बन गए वो,
शायद परदेशी हो गए हैं, वो।
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सविता बरई'वीणा'
सीतापुर, सरगुजा छत्तीसगढ़