Remembering Nida Fazzli Saheb on the day he departed for heaven!
कई साल बाद जब दिल को ठोकर खाने के बाद वापिस मां की गोद याद आई यानी जब दोबारा साहित्य पढ़ने का शौक जागा, तो फिर एक नाम सामने आया नाम था "निदा फाजली"। नाम पढ़ते ही सोलोमन के घोड़े की टापें सुनाई देने लगीं, और याद आया वो समंदर जो उकड़ू बैठ गया और उकता कर जिसने जहाजों को पलट दिया, याद आई बिल्ली से चूजों को बचाने के चक्कर में अंडे के गिर कर टूट जाने पर दो दिन रो रो कर नमाज़ पढ़ने वाली मां। दिलो दिमाग पर छाई हुई धुंध अचानक छंट गई, ये वही निदा फ़ाज़ली थे जिनके साथ बरसों पहले हमारा रिश्ता हिंदी की किताब से जुड़ा था। निदा यानी आवाज वो आवाज़ जो अब भी सन्नाटे में गूंजती है, वो शायर जिसकी शायरी गर्मी के मौसम में आम की मिठास की याद दिलाती है, किताब खोलने पर लगता है कि जैसे मिठाई का डिब्बा खोल दिया, आप यकीनन एक पन्ना पलटकर नहीं जा सकते, निदा खुबसूरत हैं खुबसूरत भी इतने कि अगर लेखक ना होते तो पक्का हलवाई होते, अब जो आदमी धूप में भी मिठास घोल दे वो तो हलवाई ही हो सकता है वो कहते हैं "अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप"
हमारे अपने निदा फ़ाज़ली - A Tribute to Nida fazli (Written by Akshay Gupta, Narrated by Parveen Sharma)
This excellent and serene music in the background is from https://www.youtube.com/@LOOPHOLEBD/videos
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