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(Amit Dagar & Dr Aarti)
पैसा
मैं 12वीं में था जब एक दिन पापा ने मुझे 100 रुपये के नोटों की एक गड्डी गिनने को दी। मैंने गिनकर बता दिया और गड्डी वापिस दे दी। नोट देखने के बाद पापा ने मुझे तगड़ी डांट इस बात पर मारी कि मैंने गड्डी के नोटों को सीधा करके एक तरफ से नही लगाया था।
ग्रेजुएशन में था जब एक बार मैंने किसी भिखारी को 10 रुपये दे दिए। मम्मी ने बड़े गर्व से पापा को ये बात बताई तो पापा ने कहा अपनी कमाई में से देगा तब पता चलेगा।
बास्केटबॉल खेलता था तो उस समय पावर के जूते बहुत चलते थे। मैंने भी 450 रुपये के पावर के जूते खरीद लिए। ओहो, इतनी डांट पड़ी थी कि उसके बाद मैंने बास्केटबॉल खेलना छोड़ दिया था।
पैसा पहले सिक्कों में ओर फिर नोट में मिलता था। फिर प्लास्टिक मनी यानी डेबिट/ क्रेडिट कार्ड का जमाना आया। आजकल तो वर्चुअल मनी है। आज की जनरेशन के बच्चे पैसे रखते ही नहीं। ऑनलाइन खुद के वॉलेट में पैसे रखते हैं, वहीं खरचते हैं। कमाल ये है कि पैसे खर्च करके कैशबैक ओर कूपन से ओर पैसे कमा भी लेते हैं । मुझे पैसे कमाने के लिए नोकरी लगने का इन्तेजार करना पड़ा था।
हमें तो पैसे की कीमत हमारी जेब में रखे पैसों से ही पता चलती थी और है। दादा, दादी, मम्मी, पापा, व अन्य लोगों आदि से जब कभी पैसे मिलते तो कितने दिन बचा के रखते थे उन पैसों को। थोड़ा थोड़ा खर्चते थे। वर्चुअल मनी की वजह से आज ओर आने वाली जनरेशन को पैसे की कीमत ही नही पता। पैसा कमाने में कितनी मेहनत लगती है ये भी नही पता। इसलिए उनके लिए पैसों की बहुत अहमियत नहीं शायद।



