Vidyantriksh Parenting Series | Ep3 | Adamant Mind | ज़िद्द | TeacherParv Podcasts
(Amit Dagar & Dr Aarti)
परिवार में जब भी जनरेशन बदलती है तो जनरेशन गैप आना स्वाभाविक है। बच्चों में जोश ओर जुनून होता है, बड़ो में ठहराव ओर तजुर्बा। यही अक्सर टकराव या इस गैप का कारण भी बनता है। ओर किसी टकराव की स्थिति को बड़े अपने तजुर्बे के कारण बेहतर सम्भाल सकते हैं। बच्चों को प्यार से तो फिर भी समझाया जा सकता है, डांट या धौंस से नही मानते। क्योंकि जिद्द करने ओर बहस जीतने में बच्चा खुद का नुकसान नहीं देखता।
10वीं के बाद पापा ने पूछा, क्या सब्जेक्ट लोगे। जैसे बच्चों में एक ईगो होती है अपने आप को होशियार साबित करने की, उसी हौसले से मैंने कहा, नॉन मेडिकल। पापा बोले बेटा, तेरे मैथ में 50 नम्बर भी नही हैं, कैसे चलाएगा नॉन मेडिकल। जिद्द। (मन मे मुझे पता था कि वो सही कह रहे हैं, लेकिन वो उम्र ही ऐसी होती है। आज 50 परसेंट वाले बच्चों को साइंस विषय लेने की जिद्द करते देखता हूँ तो चुप हो जाता हूँ) मैंने कहा, मैं पढूंगा, ओर मेहनत करूंगा। पापा चुप हो गए। मैंने नॉन मेडिकल ली, 11वीं तो कर ली लेकिन 12वीं में फेल हो गया। भले ही मुझे कितनी फालतू बातों पर डांट पड़ी हो, लेकिन फेल होने पर मुझे पापा या मम्मी ने कभी कुछ नहीं कहा। मैंने सितंबर एग्जाम में 12वीं पास की (नॉन मेडिकल से) ओर फिर ग्रेजुएशन आर्ट्स विषयों से पढ़ी।
मैं बास्केटबॉल खेलता था। मुझे अच्छा लगता था। ओर बास्केटबॉल में जूते बहुत घिसते हैं। तो जो साथी खिलाडी अच्छे थे, प्रोफेशनल बनना चाहते थे, उन दिनों वो लिबर्टी के जूते पहनते थे, कुछ खिलाड़ी पावर कंपनी के, ओर साधारण परिवार से आने वाले खिलाड़ी आम जूते पहनते थे। उन दिनों सोल लगवाने का काफी चलन था। मैंने भी एक दो बार तो सोल लगवाई, फिर मैं एक दिन पावर के जूते खरीद लाया। उन दिनों शायद 400- 450 रुपये के आते थे। क्लास वन अफसर का बेटा होने की वजह से मुझे बहुत महंगे भी नही लगे। लेकिन पापा ने जूते देखे तो जो डांट पड़ी मुझे, बता नही सकता। जिद्द। मैंने उस दिन के बाद बास्केटबॉल नही खेली।
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