
आज केरल में जो हुआ , उसकी जितनी भर्त्सना की जाए उतनी ही कम, ऐसी घटनायें हमें सोचने और विवश करती हैं कि क्या सिर्फ गुनहगारों को उनके किये की सज़ा देना ही काफी है! यदि उन्हें सजा मिल भी जाती है तो क्या आनेवाले समय मे जानवरों पर ऐसे ज़ुल्म होना बंद हो जाएंगे? इंसानियत पर सवाल उठाने वाले इन कृत्यों पर गहन मंथन की आवश्यकता है!
Jun 3, 2020
5 min

शीतल को घर आने में काफी देर हो गयी थी, प्रायः वो कॉलेज से 4:30-5:00 तक आ जाती थी, आज पता नहीं क्या बात हो गयी कि रात के 8:00 बज गए और शीतल की कोई खबर नहीं। फोन भी नहीं लग रहा उसका, पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ और कभी किसी सहेली के घर भी जाना होता था तो बता के जाती थी, ऐसे अचानक से गायब होना शीतल का स्वभाव नहीं। शीतल के माता -पिता का मन घड़ी की सुइयों के साथ तमाम तरह की आशंकाओं से ग्रसित हो रहा था और हो भी क्यूँ ना, एक तो मुठ्ठी भर का शहर, ऊपर से आजकल का माहौल, ऐसे में जवान लड़की का यूँ लापता होना किसी बड़ी अनहोनी का इशारा करता है....
Jun 1, 2020
8 min

हमारी ज़िंदगी के अधूरे फलसफे अक्सर हमें छोड़ जाते हैं ऐसे हालात पर, जिससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है, पर वो ज़िंदगी ही क्या जिसमें कोई अधूरी ख्वाहिश या फ़साना ना हों! पर हाँ जितनी अनमोल हमारी ये अधूरी ख़्वाहिशें और सपने होतें हैं, उससे कई गुना ज़्यादा सुकून देता है सम्पूर्णता का एहसास! ये एहसास तब और सुखद हो जाता है जब ये जीवन में एक ठोकर खाने के बाद मिलता है, वो कहते हैं ना "दिल का दर्द सिर्फ दिलजले ही समझते हैं".. इसी पर आधारित है ये "गुज़ारिश" !!!
May 31, 2020
2 min

वर्तमान परिस्थिति को लेकर मन मे कुछ उहापोह सी मची पड़ी थी, इसी पर आधारित है आज का चिंतन, कुछ ऐसे प्रश्न जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं!
May 30, 2020
6 min

अक्सर रफ्तार के ज़ुनून में युवा सुरक्षा मानकों को ताक पर रखते हैं, उनकी यह लापरवाही उनके परिजनों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होती, ऐसी ही एक घटना का चित्रण है ये रचना!
May 29, 2020
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हमारे लिए सबसे मुश्किल वक्त वह होता है जब हम अपने अंतर्मन के द्वंद को, हमारी आंतरिक पीड़ा एवं दंश को , अपने परिजनों के सम्मुख व्यक्त नही कर पाते, आज के दौर में अन्यान्य युवा ऐसी ही मनोस्थिति से गुज़र रहे हैं, जो उनके परिजनों को अक्सर असमंजस की परिस्थिति में डाल देती है, इसी मनोभाव पर आधारित है "मेरी गुड़िया"!
May 29, 2020
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तत्कालीन परिस्थितियाँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं, कि इतने झंझावात भरे जीवन का क्या औचित्य है? क्या हमारी महत्वाकांक्षाएँ हमारे अपनों से बड़ी हैं? आखिर क्या मायने हैं इस जीवन के? अंततोगत्वा बचेंगे, तो सिर्फ ये शिलालेख ही ना!
May 28, 2020
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