Show notes
ऋतुराज बसंत में चलने वाली हवा को इस कविता में एक चंचल, अल्हड़, नटखट, शोख किशोरी की तरह प्रस्तुत किया गया है। जिस प्रकार बसंत ऋतु की मादकता से हर प्राणी उल्लास और उमंग से भर जाता है, बावरा सा हो जाता है ठीक उसी प्रकार हवा पर भी बसंत का असर हो गया है और वह भी बावरी हो गई है।

