ग़ज़ल-गुरु
ग़ज़ल-गुरु
Raz Nawadwi
राज़ की आवाज़- रविश बदली है जीने की, हक़-ए-मदफ़न नहीं बदला
2 minutes Posted Jan 31, 2021 at 3:22 pm.
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#ग़ज़लغزل: ४२५
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1222-1222-1222-1222
दोस्तो, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज के दिन पेश है मेरी 425 वीं ग़ज़ल, इसके साथ ही आपलोगों के आशीर्वाद से पाँचवें शतक का एक क्वार्टर पूरा। 😁💞🙏. तो लीजिए, मुलाहिज़ा फ़रमाएँ, अर्ज़ किया है-
रविश बदली है जीने की, हक़-ए-मदफ़न नहीं बदला
कि गुल आये गये कितने, कभी गुलशन नहीं बदला //१
ज़मीं बदली, फ़लक बदला, कि बदला चाँद भी लेकिन
हमारे गाँव की मिट्टी का सोंधापन नहीं बदला //२
वहाँ तुलसी है अम्मा की लगी ये सोचकर हमने
मकाँ की साख़्त तो बदली मगर आँगन नहीं बदला //३
बहुत जम कर निभाते हैं किसी से भी अदावत हम
कि हमने दोस्त तो बदले मगर दुश्मन नहीं बदला //४
करोड़ों ख़र्च करती आई हैं सरकारें मुफ़लिस पे
अमीरे मुल्क तो बदले मगर निर्धन नहीं बदला //५
वही भाला, वही तेवर, वही है ताव मूँछों पे
कि मूरत में भी राणा का कभी जोबन नहीं बदला //६
हमारे इज़्दिवाजी प्यार की खिचड़ी पकी यूँ 'राज़'
कि हमने आँच तो बदली मगर ईंधन नहीं बदला //७
#राज़_नवादवी®
(एक अंजान शाइर)
💞░R░a░z░ ░N░a░w░a░d░w░i░💞
#راز_نوادوی
(ایک انجان شاعر)
रविश- अंदाज़, मिज़ाज
हक़- सच्चाई
मदफ़न- मुर्दे के दफ्न होने की जगह, क़ब्र, समाधि-भवन
फ़लक- आसमान
साख़्त- संरचना, बनावट
अदावत- दुश्मनी
मुफ़लिस- ग़रीब
जोबन- जवानी
इज़्दिवाजी- वैवाहिक