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केदारनाथ सिंह जी की भाषा प्रातिरोध की भाषा तो लगती ही है परंतु भावों को प्रेम में पिरो कर जादू भी करती हैं।
कटाक्ष हो या चुप्पी वाली गहनता।
आइये सुनते हैं - कुछ अपना!
बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएँ
यह शहर कि जिसकी ज़िद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आज़ादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ
जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं ज़ंजीरें--- Send in a voice message: https://anchor.fm/teacherparv/message

