
ये उलझने भी अब अज़ीब सी लग रही है बगैर तेरे ये शहर भी रंगहीन सी लग रही है
वैसे तो दूरियाँ भी हैं बहुत ... हमारे दरमियाँ
मेरी ख़ामोशियों को समझने वाली बस तेरी कमी सी लग रही है..
मंजर जो दिख रहा अब फिज़ाओं में
वक़्त रद्दी के भाव में बिक रहा बाजारों में...
रब ने तुम्हें सजाया है सितारों से..
यूँ ही नहीं मिले हो तुम मुझे...
ढूँढा है मैंने तुझे लाखों हज़ारों में..
Jan 20, 2021
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