Show notes
ये कविता हम सब की माँ के लिए है, जो अपना जीवन हमारी परवरिश हमारी चिंता में निकाल देती है,जिसे अपने स्वास्थ्य की कोई परवाह नहीं होती,फिर भी इस दौर में बच्चे इतने उदासीन है माँ के प्रति वो भूल जाते हैं माँ ने उनके लिए क्या नहीं किया,वो माँ के इस समर्पण को उसका फ़र्ज़ मान लेते है,ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हमारी माँ बिल्कुल अकेली पड़ गई क्योंकि हमारे पास समय कहाँ है वर्चुअल वर्ल्ड निकल कर कुछ समय अपनी प्यारी माँ के साथ बिता लें कुछ उसकी भी सुन लें,कुछ उसकी भी जान लें कि वो चाहती क्या है।

