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स्टेशन के नीचेएक कौवाएक मरे चूहे कोनोच रहा था।तभी ऊपर खड़ा मैंएक कविता सोच रहा था।ना जाने क्या था!जिसे विस्मय से देख रहा था।नोचता नोचता उबताउसका मन।सोचता सोचता मैंपड़ गयाजाने किस उलझन?कितना अंतर थाहम दोनों की करनी में।लेकिन कुछ तो था,जो गलत था।कौवा हिंसा कर रहा था,मैं उसे देख खड़ा था।पर कोई था।जो बेचारा!बेजान पड़ा था।MUKESH KUMAR SONINET Qualified in YogaM.A. in Yoga,M.A. in Hindi,Post Graduate in Yoga and NaturopathyM-9836783469,9088102430



