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हिंदी आलोचना में एक शब्द चलता है आम पाठक। हमने बड़ा सोचा कि यह आम पाठक कहाँ, किस गली कूचे में मिलता है? किसी रचना को नकारना हो तो बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि ये आम पाठक की समझ में नहीं आएगा। यह एक अमूर्त सी बात है। कोई पाठक आम पाठक नहीं होता, बल्कि वह बड़ा विशिष्ट पाठक होता है।
Curation and Cover Art: Irfan
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