Listen with Irfan
Listen with Irfan
S.M.Irfan
Meri Filmi Atmakatha 16 | Balraj Sahni | Recited by Irfan
25 minutes Posted Nov 10, 2022 at 5:30 pm.
0:00
25:55
Download MP3
Show notes

"वहां से सेट तक अहाते में कई चमचमाती हुई मोटरें खड़ी थीं। मैंने इधर-उधर देखा और एक दो  पर थूका। फिर बाकी मोटरों पर मन ही मन थूका। जब मैं सेट पर पहुंचा तो अनवर (अभिनेता) की तरफ ऐसी हिकारत से घूरकर देखा जैसे वे सचमुच अपनी बहन (मीना कुमारी) के टुकड़ों पर पलते हैं (आज यह सब सोचकर मन में बड़ी ग्लानि होती है)। और जब अनवर ने मेरी नजर के सामने आंखें झुका लीं तो मैंने जीत का गुरूर महसूस किया।

(फिल्मों के) इस समाज में हर आदमी दूसरे आदमी का दुश्मन है। इसीलिए तो इस किस्म के फिल्मी मुहावरे सुनाई देते हैं 'वह उसे खा गया' 'वह उस पर छा गया'। आज देखता हूं कि कौन मुझे खाता है और कौन मुझ पर छाता है, मैं अपने मन में बार-बार कह रहा था। अजीब बात थी के पूरे दृश्य के संवाद मुझे अपने आप याद हो आए। रिहर्सल में मैं इस तरह बोला जैसे बाज चिड़िया पर झपटता है। जिया (सरहदी) ने मुझे सीने से लगा लिया। मेरे पास खड़े मेरे गुरु (सरीखे) नागरथ की आंखें चमक रही थीं। उस दिन खुशी भरे वातावरण में शूटिंग हुई। पूरे स्टूडियो में जैसे नया खून दौड़ गया।

कहावत है ना कि चूहा सोंठ का टुकड़ा पाकर पंसारी बन बैठा था। मैं भी नफरत पाकर कलाकार बन गया। अगर मेरा रोल या वह दृश्य किसी और मूड का होता तो यह नफरत काम न आती। और क्योंकि मुझे वह नफरत रास आ गई थी, इसलिए वह सब रोगों की दवा प्रतीत होने लगी। मैं जिया की उम्मीदों पर कुछ-कुछ पूरा उतरने लगा। मैं जो कुछ कर रहा था वह फिल्म अभिनय की दृष्टि से घटिया था। पर उस पात्र के संदर्भ में वह बहुत अनुकूल और सही था। मेरी कश्ती भंवर में से निकल आई। खुशकिस्मती से संवाद काव्यात्मक और नाटकीय थे।

छोटी सी हार पर हौसला छोड़ देना और छोटी सी जीत पर फूल कर कुप्पा हो जाना अनाड़ी कलाकार की पहली निशानी है। ज्यों ही मेरी गाड़ी चल पड़ी, मैं दोस्तों-साथियों में बैठकर बढ़- चढ़कर बातें करने लगा।"

~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

(प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

---
Send in a voice message: https://podcasters.spotify.com/pod/show/sm-irfan/message