Show notes
इब्द्ताद-ए-इश्क़ है रोता है क्या ....
आगे आगे देखिये होता हे क्या
बशीर बद्र की गज़ल .... कोई शाम घर में रहा करो .... ऐसा लगता है जैसे किसी ऐसे पथिक की कहानी हो जो खुद की खोज में एक कभी न ख़त्म होने वाली यात्रा पर निकला हुआ है। शायद हम सभी में ये बंजारा पथिक कहीं न कहीं है जो मंज़िल को नहीं जानता..... जानता है तो सिर्फ चलना .....


