मुनासिब नहीं की बैठ जाऊ मैं थक कर,
हिम्मत कर दो कदम मुझे बढ़ाना ही होगा ।
बस थोड़ा पस्त हुआ हूँ, परास्त नहीं मैं
फिर से सम्बल उठाना ही होगा ।।
सबकी अपनी रफ़्तार थी,
कोई धीमी कोई तेज़ गति से निकल गया ।
मेरी गुमनामी में मुझे छोड़ जाने वालों,
एक दिन तुम्हे वापस आना ही होगा ।।
मुनासिब नहीं की बैठ जाऊ मैं थक कर,
हिम्मत कर दो कदम मुझे बढ़ाना ही होगा ।।
खुद कामयाबी हाथ आएगी, ऐसा नहीं चाहता मैं
कुआं कभी आएगा प्यासे के पास, ऐसा नहीं सोचता मैं ।
कही इस आस में प्यास से न मर जाऊं मैं,
दबे पाँव उस तक मुझे जाना ही होगा ।।
मुनासिब नहीं की बैठ जाऊ मैं थक कर,
हिम्मत कर दो कदम मुझे बढ़ाना ही होगा ।।
अवशेष दबे पड़े है पाताल में,
कुछ कोयले कुछ लोहे बन जायेंगे।
बेशक मुझे और दबा दे विधाता,
तुम्हें मुझे हीरा बनाना ही होगा।।
मुनासिब नहीं की बैठ जाऊ मैं थक कर,
हिम्मत कर दो कदम मुझे बढ़ाना ही होगा ।।
मुनासिब नहीं की बैठ जाऊ मैं थक कर,
हिम्मत कर दो कदम मुझे बढ़ाना ही होगा ।
बस थोड़ा पस्त हुआ हूँ, परास्त नहीं मैं
फिर से सम्बल उठाना ही होगा ।।
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