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मई की तपती गर्मी वो सूरज का यौवन गर्म हवाओं के बीच पांचली के कोरोना अस्पताल एक एम्बुलेंस दौड़ी चली आ रही थीवो सायरन के आवाज में जैसे कोरोना-कोरोना चिल्ला रही थी सब डरने लगे है मुझसे जैसे वो सबको बतला रही थीएक एम्बुलेंस तेजी से दौड़ी चली आ रही थीउसमे था एक फूल सा बच्चा जिसकी रिपोर्ट कोरोनापॉजिटिव आ रही थीं पीछे-पीछे थी माँ बाप की गाड़ी उसमे से रोने की सिसकियों की आवाज आ रही थी मानो वो सच मे सायरन की उस आवाज को जैसे हरा रही थीएक एम्बुलेंस दौड़ी चली आ रही थी माँ का कलेजा फटा जा रहा था..बाप के चेहरे पर गहरी उदासी छाए जा रहे थीं ..वो मुँह पूछना चाहती थी साड़ी के पल्लू से अपने फूल से बच्चे का मगर बीचमें वो कोरोना की बीमारी आ रही थीएक एम्बुलेंस दौड़ी चली जा रही थींवो आंखों से निकली आँसू की धारा मानो जैसे मास्क की वर्षों की प्यास बुझा रही थी शुक्र है मगर उनको जिले के बड़े बड़े मेडिकल कॉलीजो से ज्यादा छोटी सी गुलाबी बिल्डिंग में उम्मीद नजर आ रही थीएक एम्बुलेंस दौड़ी चली आ रही थीपिता के हाथ मे एक बड़ा सा बस्ता बताया उन्होंने फूल से बच्चे को इसमें रखे काजू , बादाम, पिस्ता..बताते बताते जबान लड़खड़ा रही थी एक एम्बुलेंस मानो जैसे छाती पर चढ़ी चली आ रही थी✍️विकास कसाना की कलम से

