Show notes
भले दिनों की बात हैभली सी एक शक्ल थीन ये कि हुस्न-ए-ताम होन देखने में आम सीन ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगेमगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगेकोई भी रुत हो उस की छबफ़ज़ा का रंग-रूप थीवो गर्मियों की छाँव थीवो सर्दियों की धूप थीन मुद्दतों जुदा रहेन साथ सुब्ह-ओ-शाम होन रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िदन ये कि इज़्न-ए-आम होन ऐसी ख़ुश-लिबासियाँकि सादगी गिला करेन इतनी बे-तकल्लुफ़ीकि आइना हया करेन इख़्तिलात में वो रमकि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशेंन इस क़दर सुपुर्दगीकि ज़च करें नवाज़िशेंन आशिक़ी जुनून कीकि ज़िंदगी अज़ाब होन इस क़दर कठोर-पनकि दोस्ती ख़राब होकभी तो बात भी ख़फ़ीकभी सुकूत भी सुख़नकभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँकभी उदासियों का बनसुना है एक उम्र हैमुआमलात-ए-दिल की भीविसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्याफ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भीसो एक रोज़ क्या हुआवफ़ा पे बहस छिड़ गईमैं इश्क़ को अमर कहूँवो मेरी ज़िद से चिड़ गईमैं इश्क़ का असीर थावो इश्क़ को क़फ़स कहेकि उम्र भर के साथ कोवो बद-तर-अज़-हवस कहेशजर हजर नहीं कि हमहमेशा पा-ब-गिल रहेंन ढोर हैं कि रस्सियाँगले में मुस्तक़िल रहेंमोहब्बतों की वुसअतेंहमारे दस्त-ओ-पा में हैंबस एक दर से निस्बतेंसगान-ए-बा-वफ़ा में हैंमैं कोई पेंटिंग नहींकि इक फ़्रेम में रहूँवही जो मन का मीत होउसी के प्रेम में रहूँतुम्हारी सोच जो भी होमैं उस मिज़ाज की नहींमुझे वफ़ा से बैर हैये बात आज की नहींन उस को मुझ पे मान थान मुझ को उस पे ज़ोम हीजो अहद ही कोई न होतो क्या ग़म-ए-शिकस्तगीसो अपना अपना रास्ताहँसी-ख़ुशी बदल दियावो अपनी राह चल पड़ीमैं अपनी राह चल दियाभली सी एक शक्ल थीभली सी उस की दोस्तीअब उस की याद रात दिननहीं, मगर कभी कभी--- Send in a voice message: https://podcasters.spotify.com/pod/show/himanshu-kalia/message


