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https://youtu.be/v3WuJyYsOtU मधु कांकरिया :: :: :: काली चील :: कहानीकोई स्मृति जिंदगी से बड़ी नहीं होती। और न ही कोई सोच।पर कुछ स्मृतियाँ, कुछ जिन्दा और गर्म अहसास टीस बन कर ताउम्र सालते रहते हैं आपको।चेखव की एक कहानी पढ़ी थी - एक क्लर्क की मौत। जिसमे एक क्लर्क होता है। एक बार वह थिएटर हॉल में कोई नाटक देख रहा होता है कि अचानक उसे जोर से छींक आती है, छींक इतनी तेज होती है कि छींक के कुछ छींटे सामने बैठी मटकी-सी मोटी और गंजी खोपड़ी पर गिर जाते हैं। गंजी खोपड़ी घूम कर, आँखें तरेर कर पीछे देखती है तो क्लर्क के होश उड़ जाते हैं।वह उसका बॉस था।बॉस उससे कुछ नहीं कहता, पर अफसरशाही का आतंक, उसके मांस में ही नहीं हड्डियों तक में धंसा था। वह और अधिक चैन से बैठ नहीं पाता, बार बार उसे लगता कि अनजाने ही सही पर उससे भयंकर अपराध हो गया है। उसकी बदतमीज छींक के गंदे छींटे बॉस की खोपड़ी पर नहीं पड़ने चाहिए थे, जाने बॉस क्या सोचे, कौन जाने उसे नौकरी से ही...डर पंख पसारने लगा, बॉस का आतंक कंधे पर बैठे गिद्ध की तरह हर पल उसे अपनी नुकीली नोक से लहूलुहान करने लगा। अब गई नौकरी! थिएटर ख़त्म किये बिना ही वह घर लौट आता है और सीधे पहुँचता है, बॉस के यहाँ। काफी इंतजार के बाद बॉस घर आता है। जैसे ही बॉस की निगाह उस पर पड़ती है, वह गिड़गिड़ाता है - बॉस, मैंने जानबूझ कर नहीं छींका। मुझे माफ कर दें। बॉस उसे कुछ नहीं कहता है बस एक ठंडी और उदासीन नजर उस पर डाल कर रह जाता है। वह और अधिक डर जाता है। बॉस सचमुच उससे बहुत नाराज है, इसीलिए उसने मेरी बात का जबाब तक नहीं दिया। उसके वजूद का अंश अंश इस डर से ग्रस्त हो जाता है कि उससे दुनिया का सबसे बड़ा अपराध हो गया है। बॉस के आतंक के नुकीले कांटे उसे रह रह कर चुभते हैं, पल भर के लिए भी वह पलक तक झपका नहीं पाता है, खौफ और तनाव की नोक पर टंगा वह आधी रात में ही फिर जा पहुँचता है बॉस के घर - सर, मुझे माफ कर दे, मैंने जान बुझ कर नहीं छींका था, इस बार बॉस सचमुच अपना आपा खो देता है, और चीख कर कहता है - गेट आउट।

