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एकश्लोकि श्री आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित है। इसमें एक श्लोक में ही आत्मज्ञान के बारे में गुरु और शिष्य का संवाद विराजमान है। पूरा प्रकरण एक श्लोक मात्र में। इस श्लोक का पाठ वेदांत आश्रम के अंतेवासियों ने किया है।
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