Show notes
फ़ौजी पसीना बहाता है कि देश का ख़ून काम बहे..वक़्त दिखता तो तुझे सीने से लगा रखता कहींवो हवा सा ऐसा बहा, आँखों में ओझल हो गया दूरियाँ संगीनों से नापते, और कुछ दिखता नहींकब लहू धमनियों का, पसीने के रास्ते घुल गयाजो कुछ बना था, हाथ की, लकीरों को यूँ तराश कर,दुश्मनी की दोस्ती में, वो भी पिघल कर रह गया हमने लहू को पास से देखा है कुछ यूँ ओढ़ करपहरे में रखा, गरम हवा में, बर्फ़ बन कर गल गयाक़तरा क़तरा जोड़ कर पाला था तुझको रात दिनएक पल रहबर मिला तू आँख भीगा कर चल दियामुझको पता मेरा, बताना भी मत, ऐ राहेगीर तुम,मैं जो मुझसे फिर मिला, सबको पता यह चल गया,कभी कभी मासूम सी नसों में दौड़ता हूँ मैं जोश में 'सौरभ' जो वतन कि तिशनगी में मैं कहीं उबाल गया..वक़्त दिखता तो तुझे सीने से लगा रखता कहींवो हवा सा ऐसा बहा, आँखों में ओझल हो गया दूरियाँ संगीनों से नापते, और कुछ दिखता नहींकब लहू धमनियों का, पसीने के रास्ते घुल गया

