Show notes
सिरचन को लोग बेकार ही नही बेगार समझते थे। इसलिए खेत खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नही बुलाता। आज सिरचान को मुफ्तखोर, कामचोर और चटोर कह ले कोई, एक समय था जब उसकी मड़ैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगो की सवारियाँ बँधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे। मानू दीदी के ससुराल के लिए मां ने भी शीतलपाटी, चिक और कुशन बनवाने के लिए सिरचन को बुलाया, लेकिन ऐसी क्या बात हो गई कि वह काम छोड़कर गुस्से से चला गया? जानने के लिए सुनिए, फणीश्वर नाथ रेणु जी की आंचलिक कहानी - ठेस!!!!! यदि आपको मेरे द्वारा पढ़ी गई कहानी पसंद आए तो मेरे चैनल को subscribe, share और like अवश्य ही करें। Thankyou 🥰



