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वृद्धावस्था में जब शरीर की सारी इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, तब जिह्वा का स्वाद ही शेष रह जाता है! प्रेमचंद जी ने ऐसी ही वृद्धावस्था को दर्शाया है ! किस तरह एक वृद्धा अपने ही स्वदेंद्रियों के वशीभूत होकर क्या करती है? जानने के लिए, सुनिए, कहानी!!!!

