कुछ कही,कुछ अनकही (Kuch Kahi,Kuch Unkahi)
कुछ कही,कुछ अनकही (Kuch Kahi,Kuch Unkahi)
Nitin Joshi
गुब्बारे पर चीता : मुंशी प्रेम चंद
7 minutes Posted Aug 30, 2020 at 2:30 pm.
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बचपन में सर्कस देखना ,नुमाइश देखना ,बहुत अच्छा लगता था , वहा जाने की एक अलग ही ख़ुशी होती थी,पर अगर वही मेले में अगर पता चले कि एक जंगली जानवर पिंजरे से छूट गया है , और इधर -उधर भटक रहा है,आपकी तो हालत ख़राब हो जाएगी । ये कहानी भी एक ऐसे लड़के की है जो सर्कस में जाकर ,एक मुसीबत उसके गले लग जाती है ,अब वो कैसे होता? क्या मुसीबत लगती है? सुनिए इस कहानी में ।


मिलते है फिर अगले हफ्ते एक नई कहानी के साथ ठीक रात 8 बजे ।

  तब तक  बने रहिये मेरे साथ और सुनते रहिये "कुछ कही कुछ अनकही " नितिन जोशी  की आवाज़ में ।

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