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जिस सम्त भी देखूं नज़र आता है कि तुम होऐ जान-ए-जहां ये कोई तुम सा है कि तुम होये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल हैये धुंध है बादल है कि साया है कि तुम होइस दीद की साअत में कई रंग हैं लर्ज़ांमैं हूं कि कोई और है दुनिया है कि तुम होदेखो ये किसी और की आंखें हैं कि मेरीदेखूं ये किसी और का चेहरा है कि तुम होये उम्र-ए-गुरेज़ां कहीं ठहरे तो ये जानूंहर सांस में मुझ को यही लगता है कि तुम होहर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल-ज़दगां काअब कौन है शीरीं है कि लैला है कि तुम होइक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूंइक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम होवो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचेइस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम होआबाद हम आशुफ़्ता-सरों से नहीं मक़्तलये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम होऐ जान-ए-'फ़राज़' इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थीहम को ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है कि तुम हो--- Send in a voice message: https://anchor.fm/bait-ul-ghazal/message



