Bait Ul Ghazal - Urdu & Hindi Poetry
Bait Ul Ghazal - Urdu & Hindi Poetry
Bait Ul Ghazal
S01E02 Jis Samt Bhi Dekhoon, Nazar Aata Hai Ki Tum Ho ~ Ahmed Faraaz जिस सम्त भी देखूं नज़र आता है कि तुम हो - अहमद फ़राज़
2 minutes Posted Apr 15, 2022 at 5:23 pm.
0:00
2:02
Download MP3
Show notes
जिस सम्त भी देखूं नज़र आता है कि तुम हो
ऐ जान-ए-जहां ये कोई तुम सा है कि तुम हो
ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है
ये धुंध है बादल है कि साया है कि तुम हो
इस दीद की साअत में कई रंग हैं लर्ज़ां
मैं हूं कि कोई और है दुनिया है कि तुम हो
देखो ये किसी और की आंखें हैं कि मेरी
देखूं ये किसी और का चेहरा है कि तुम हो
ये उम्र-ए-गुरेज़ां कहीं ठहरे तो ये जानूं
हर सांस में मुझ को यही लगता है कि तुम हो
हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल-ज़दगां का
अब कौन है शीरीं है कि लैला है कि तुम हो
इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूं
इक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो
वो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचे
इस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो
आबाद हम आशुफ़्ता-सरों से नहीं मक़्तल
ये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो
ऐ जान-ए-'फ़राज़' इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी
हम को ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है कि तुम हो
---
Send in a voice message: https://anchor.fm/bait-ul-ghazal/message