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भेड़चालHomepageसाहित्यBhedchaal in साहित्यअंतिम ऊँचाई- कुँवर नारायण की कविताAmtim Unchai Poemकुँवर नारायण की कविता, Kunwar Narayan, हिंदी कविता, कविता,सफलता, कुँवर नारायण, Hindi Poem, Hindi Poem, Poem on Woman, Poem of Kunwar Narayan, Success, प्रेरणा, motivation, antim unchai poem, antim unchai, antim oonchai, antim uchai, antim uchai by kunwar narayan, antim unchai by kunwar narayan, antim unchai kunwar narayan, antim unchai poemकितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलबअगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं,हमारे चारों ओर नहीं।कितना आसान होता चलते चले जानायदि केवल हम चलते होतेबाक़ी सबरुका होता।मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया कोदस सिरों से सोचने और बीस हाथोंसे पाने की कोशिश मेंअपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।शुरू-शुरूमें सब यही चाहते हैंकि सब कुछ शुरूसे शुरू हो,लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं।हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहतीकि वहसब कैसे समाप्त होता हैजो इतनी धूमधामसे शुरू हुआ थाहमारे चाहने पर।दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुएजब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे—जब तुम्हें लगेगा किकोई अंतर नहीं बचा अबतुममें और उन पत्थरों की कठोरता मेंजिन्हें तुमने जीता है—जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगेऔर काँपोगे नहीं—तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़ नहींसब कुछ जीत लेने मेंऔर अंततक हिम्मत न हारने में।

