रामायण
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रामायण रिकैप्स में आपका स्वागत है, पॉडकास्ट जहां हम रामायण के महाकाव्य हिंदू धर्मग्रंथ में तल्लीन हैं। प्रत्येक एपिसोड, हम आपके लिए प्रसिद्ध रामायण टीवी शो से ऑडियो लाते हैं, जिसमें भगवान राम, उनकी पत्नी सीता और राक्षस राजा रावण को हराने की उनकी यात्रा की क्लासिक कहानी को फिर से बताया गया है।जैसा कि हम कहानी सुनते हैं, हम अपनी अंतर्दृष्टि और विश्लेषण भी प्रदान करते हैं, उन विषयों, पात्रों और प्रतीकों की खोज करते हैं जो रामायण को एक कालातीत कृति बनाते हैं। हम कहानी के माध्यम से चलने वाले प्रेम, वफादारी और भक्ति के संदेशों के साथ-साथ महाकाव्य लड़ाइयों और दैवीय हस्तक्षेपों पर चर्चा करेंगे जो इसे इतना रोमांचकारी बनाते हैं।चाहे आप लंबे समय से रामायण के प्रशंसक हों या कहानी के लिए नए हों, हमारा पॉडकास्ट आपको एक मनोरम यात्रा पर ले जाएगा जो हिंदू पौराणिक कथाओं की आपकी समझ को समृद्ध करेगा और आपको पात्रों की वीरता और ज्ञान से प्रेरित करेगा।तो हमारे साथ जुड़ें क्योंकि हम रामायण के अध्यायों के माध्यम से यात्रा करते हैं और इस पौराणिक महाकाव्य के जादू और आश्चर्य का अनुभव करते हैं। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
रामायण - EP 25 - राजा जनक का न्याय। भरत का राम की चरण पादुकाओं के साथ अयोध्या लौटना।
भरत के बाद राजा जनक भी राम से मिलने चित्रकूट पहुँच जाते हैं। सभी में आशा जागती है कि राजा जनक अपने वचनों से राम को अयोध्या वापस जाने के लिये राजी कर लेंगे। सीता अपने माता पिता से मिलती हैं। बेटी को तपस्विनी वेश में देखकर पिता भावुक होते हैं लेकिन अपनी बेटी के संस्कारों को देखकर उन्हें गर्व की अनुभूति भी होती है। रानी सुनयना राजा जनक को सभी की इच्छा से अवगत कराती हैं कि वे राम को अयोध्या लौटने के लिये प्रेरित करें। भरत भी माता कौशल्या को राजी करने का प्रयास करते हैं कि वे माता के विशेषाधिकार का प्रयोग कर राम को अयोध्या लौटने का आदेश दें। उधर कैकेयी राम के पास जाती हैं और कहती हैं कि यदि वो उसे अपनी माँ मानता है तो उसकी आज्ञा मानकर अयोध्या चले। राम फिर तर्कों का सहारा लेते हैं और कहते हैं कि यदि वो उन्हें एक तिरस्कृत जीवन जीने को मजबूर करना चाहती हैं तो वह अयोध्या वापस चलने को तैयार हैं। कैकेयी को निरुपाय होना पड़ता है। अगले दिन सभा की अध्यक्षता राजा जनक को सौंपी जाती है। राम जनक की आज्ञा का वचन देते हैं। भरत भी उनसे निष्पक्ष न्याय की गुहार लगाते हैं और राम के वहीं वन में राज्याभिषेक की माँग करते हैं। भगवान शंकर का स्मरण कर राजा जनक न्याय करने बैठते हैं। पहले वे कहते हैं कि भगवान भी भक्त के निश्चल प्रेम के आगे विवश होते हैं। यहाँ भरत का अपने भाई के प्रति भक्ति और प्रेम अथाह है इसलिये उनका पलड़ा भारी है। राजा जनक के ये वचन सुन भरत समेत सभी के चेहरे खिल उठते हैं। लेकिन अगले ही पल जनक प्रेम का दूसरा पक्ष भी रखते हैं और कहते हैं कि प्रेम निस्वार्थ होना चाहिये। प्रेम कुछ माँग नहीं सकता बल्कि अपने प्रेमी को कुछ देता है, उसके सुख के लिये सब कुछ लुटा देता है। जनक भरत से कहते हैं कि वे राम से उनकी प्रसन्नता पूछें और उसे पूजा समझ कर पूरा करें। भरत राम के चरणों में बैठकर उनकी इच्छा पूछते हैं। राम भी भरत के प्रेम के आगे हारकर अयोध्या का राज्य स्वीकार करते हैं किन्तु पिता का वचन पूरा करने के लिये वनवास की चौदह साल की अवधि पूरी होने तक भरत को राज्य की देखभाल का दायित्व सौंपते हैं। भरत राम को उनके वचन से बाँधने के लिये घोषणा करते हैं कि यदि उन्होंने चौदह साल से एक दिन भी देरी लगाई तो वे अग्निप्रवेश कर लेगें। भरत राम से उनकी चरण पादुकाएं लेते हैं ताकि उन्हें राज सिंहासन पर रखकर वे राम के प्रतिनिधि के रूप में राजकाज सम्भालें। भरत बड़े भाई की चरण पादुकाएं शीश पर रखकर लौटते हैं। विदाई के इस भावुक पल में सभी की आँखों से अश्रुधारा बहती है। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Oct 28, 2023
35 min
रामायण - EP 24 - कैकेयी द्वारा मृत्यु दण्ड की माँग। भरत द्वारा राम से राज्य सम्भालने की याचना।
राम और भरत का मिलाप बहुत ही भावुक वातावरण में होता है। राम द्वारा पिता की कुशलता के बारे में पूछे जाने पर भरत रुँधें गले से उनके निधन का समाचार देते हैं। राम लक्ष्मण गले लगकर रोते हैं। तभी गुरु वशिष्ठ और तीनों रानियाँ कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा वहाँ पहुँचती हैं। राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे कौशल्या की बजाय पहले माता कैकेयी के चरण स्पर्श करते हैं। कैकेयी को अपराध बोध है लेकिन राम के मन में कोई मलाल नहीं। वे इसे नियति का खेल मानते हैं। तत्पश्चात राम माता सुमित्रा और कौशल्या से मिलते हैं। महर्षि वशिष्ठ के आदेश पर राम और लक्ष्मण से अपने दिवंगत पिता को तिल और मन्दाकिनी के पवित्र जल से तर्पण करते हैं। रात्रि में राम गुरु वशिष्ठ के और सीता बारी बारी तीनों माताओं के चरण दबा कर सेवा धर्म निर्वाह करती हैं। ग्लानि से भरी कैकेयी सीता से कहती है कि वह राम से कहकर उसे मृत्युदण्ड दिलाये जिससे वो अपनी लज्जित जीवन से छुटकारा पा सकें। माता सुमित्रा सीता से जानती हैं कि लक्ष्मण उनकी किस प्रकार सेवा करते हैं। अगले दिन महर्षि वशिष्ठ सभा आहूत करते हैं। राम सभा में गुरु वशिष्ठ की आज्ञा का पालन करने की प्रतिज्ञा करते हैं। सभी के चेहरों पर आशा की किरण जगमगा जाती है लेकिन अगले ही पल राम यह भी कह देते हैं कि गुरुदेव उन्हें नीति और धर्म सम्मत आज्ञा ही दें। गुरु वशिष्ठ भी ज्ञानी हैं। वे राम की कूटनीति का उत्तर देते हुए कहते हैं कि याचक नीति अनीति नहीं सोचता है। उसे केवल अपनी याचना पूरी होने से सरोकार होता है। वशिष्ठ कहते हैं कि भरत के प्रेम के आगे धर्म और नीति कोई स्थान नहीं रखती है और फिर वे भरत से बड़े भाई राम के समक्ष अपने हृदय की बात रखने को कहते हैं। भरत राम से कुल का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते राज सिंहासन स्वीकार करने की याचना करते हैं। कैकेयी भी राम से कहती हैं कि वे अपने माँगे हुए वरदान वापस लेती हैं और राम को वचनों से मुक्त करती हैं। राम कहते हैं कि वचन वापसी का अधिकार केवल पिता दशरथ के पास था और अब वो परलोक सिधार चुके हैं अतएव उनके वचन अनुरूप कार्य करना ही एकमात्र विकल्प है। भरत राम की कुटिया के सामने अन्न जल त्याग कर मरने तक वहाँ धरना देने की घोषणा करते हैं। भरत की इस बात से राम अन्दर तक हिल जाते हैं। तभी एक दूत राजा जनक और रानी सुनयना के चित्रकूट पहुँचने की सूचना लाता है। वशिष्ठ राजा जनक के आगमन तक के लिये सभा स्थगित कर देते हैं। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
May 4, 2023
35 min
रामायण - EP 23 - भरत का वन प्रस्थान। लक्ष्मण का क्रोध। राम भरत मिलाप।
पति वियोग में उदास उर्मिला को माण्डवी खुशी की समाचार देती है कि उसकी विरह की घड़ियाँ खत्म होने वाली है। आर्य भरत, राम लक्ष्मण और सीता को वापस लाने वन जा रहे हैं। अयोध्या की तमाम प्रजा भी उनके साथ जाती है। तीनों माताएं, गुरू वशिष्ठ मंत्रीगण और सेना साथ में है। मार्ग में श्रंगवेरपुर पड़ता है। यह राम के मित्र निषादराज गुह का राज्य है। एक प्रहरी निषादराज को सूचना देता है कि भरत सेना लेकर चित्रकूट जा रहे हैं। निषादराज को भ्रम होता है कि भरत राम को सदैव के लिये अपने रास्ते से हटाने के प्रयोजन से उनपर आक्रमण करने जा रहे हैं। वो युद्ध का नगाड़ा बजाकर भरत को गंगा किनारे ही घेर लेने का ऐलान कर देते हैं। तभी गाँव के पुरोहित निषादराज को भरत से मिलकर वास्तविकता जान लेने का परामर्श देते हैं। निषादराज अपनी सेना को झाड़ियों के पीछे सचेत कर भरत से मिलने जाते हैं। सुमन्त भरत को निषादराज और राम की मित्रता के बारे में बताते हैं। भरत से मिलकर निषादराज की आशंका गलत साबित होती है। वे भरत को बताते हैं कि राम और सीता घास के बिछौने पर सोये थे और नंगे पाँव चित्रकूट की तरफ गये हैं। दुखी होकर भरत खुद भी आगे की यात्रा नंगे पाँव पैदल करने का निर्णय लेते हैं। आगे बढ़ते हुए भरत भारद्वाज मुनि के आश्रम तक पहुँचते हैं और उनसे आशीर्वाद लेते हैं। यात्रा जारी रखते हुए भरत सेना के साथ चित्रकूट की धरती पर पहुँचते हैं। कोल और भील लक्ष्मण को सूर्य पताकाओं को लेकर आगे बढ़ती सेना के बारे में सूचित करते हैं। लक्ष्मण वन में लकड़ियाँ काटना छोड़ वापस पर्णकुटी पहुँचते हैं और राम से कहते हैं कि भरत सेना लेकर उनपर आक्रमण करने आ रहा है। लक्ष्मण किसी सम्भावित आक्रमण का सामना करने के लिये धनुष बाण उठा लेते हैं और भरत का वध करने की घोषणा करते हैं। तभी बिजली कौंधने के साथ आकाशवाणी होती है कि लक्ष्मण को उचित अनुचित के बीच का अन्तर कर लेने के बाद ही कोई प्रण करना चाहिये। राम भी लक्ष्मण को अधीर होने से रोकते हैं। इस बीच भरत कुटिया में पहुँचते हैं और बड़े भाई राम के चरणों में गिर जाते हैं। राम उन्हें उठाकर हृदय से लगाते हैं। यह दृश्य देखकर लक्ष्मण आत्मग्लानि से भर उठते हैं और भरत के प्रति उठे अपने गलत विचारों के लिये उनसे क्षमा माँगते हैं। शत्रुघ्न भी वहाँ आ पहुँचते हैं। चारों भाईयों का आपस में मिलाप होता है। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
May 2, 2023
33 min
रामायण - EP 22 - राजा दशरथ की अन्त्येष्टि। भरत द्वारा राजसिंहासन को ठुकरना।
भरत माता कैकेयी पर क्रोधित हैं तो शत्रुघ्न मंथरा को पीटते हुए महल से निकाल रहे हैं। उन्हें पता चल जाता है कि इस षड्यन्त्र के पीछे मंथरा की ही कुटिल बुद्धि है। भरत शत्रुघ्न को भैया राम का वास्ता देकर हिंसा करने से रोकते हैं। भरत बड़ी माता कौशल्या से मिलने उनके कक्ष में जाते हैं। कौशल्या भरत से उन्हें राम के पास वन में भिजवाने को कहती हैं। भरत इससे दुःखी होते हैं। वे माता कौशल्या से कहते हैं कि वे उन्हें भैया राम के पास वन नहीं भेजेंगे बल्कि राम को वन से वापस लायेंगे। भरत के मन में ग्लानि से है कि पापकर्म उसकी माता ने किया है किन्तु सम्पूर्ण विश्व उसे भ्रातद्रोही कहेगा। महर्षि वशिष्ठ भरत को शोक त्याग कर पिता दशरथ के पार्थिव शरीर का अन्तिम संस्कार करने का परामर्श देते हैं। पूरी अयोध्या नगरी अपने महाराज की अन्तिम यात्रा में शामिल होती है। दशरथ के सत्कर्मों की यादकर प्रजा उनकी जय जयकार करती है। भरत पिता की चिता को अग्नि देते हैं। जब अस्थि कलश को सरयू नदी में प्रवाहित करने की बारी आती है तो भरत भाव विह्वल होते हैं और कलश नदी में प्रवाहित नहीं कर पाते। वशिष्ठ उन्हें मोह त्यागकर विधान पूरा करने का उपदेश देते हैं। अगले दिन राजसभा में महर्षि वशिष्ठ और मंत्री परिषद भरत से राजसिंहासन सम्भालने को कहती है। सुमन्त कहते हैं कि राजा के बिना राज्य असुरक्षित रहता है। शत्रु हमला कर सकते हैं। तब भरत सवाल उठाते हैं कि जब यही सभा युवराज राम को राजा चुन चुकी थी और महाराज ने अपनी रानी के कहने पर युवराज को वन भेज दिया था तो किसी मंत्री ने इसके विरूद्ध आवाज क्यों नहीं उठायी। भरत कहते हैं कि ज्येष्ठ होने के कारण राम ही राजसिंहासन के अधिकारी हैं। भरत पूरी राजसभा को कहते हैं कि वो उन्हें राम को वन से वापस लाने में सहयोग करे। वशिष्ठ भरत की प्रशंसा करते हैं। भरत माता कौशल्या को भी साथ चलने के लिये राजी कर लेते हैं और कहते हैं कि वे वन में ही भैया राम का राज्याभिषेक करेंगे। रानी कैकेयी को भी अब अपनी गलती का अहसास है। वो भी पश्चाताप करने भरत के साथ वन जाने का अनुरोध करती है। कौशल्या के कहने पर भरत इस पर सहमत होते हैं। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 28, 2023
35 min
रामायण - EP 21 - भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक। भरत-कौशल्या संवाद।
राजा दशरथ का पार्थिव शरीर अन्तिम दर्शनों के लिये रघुकुल के पूर्वजों के कक्ष में रखा है। पूरी अयोध्या नगरी शोक में डूबी है। महर्षि वशिष्ठ दशरथ को धर्म और सत्य के लिये प्राणों की आहुति देने वाला महात्मा बताकर उनके चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। मंत्री सुमन्त राजा की अन्तिम आज्ञा पूरी न कर पाने की ग्लानि के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। कैकयी समेत तीनों रानियाँ भी अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्प अर्पित करती हैं। राजा दशरथ के अन्तिम संस्कार और राज्य को नया राजा देने के लिये महर्षि वशिष्ठ भरत व शत्रुघ्न को ननिहाल से बुलाने का निर्णय लेते हैं। भरत के आने तक कार्यकारी दायित्व सुमन्त को सौंपे जाते हैं। वशिष्ठ एक अन्य मंत्री श्रीधर को भरत को लिवाने कैकेय देश भेजते हैं और विशेष निर्देश देते हैं कि वहाँ राम वनवास और दशरथ के निधन की सूचना न दी जाय और सामान्य भाव से भरत को अयोध्या लाया जाय। श्रीधर से वशिष्ठ का सन्देश पाकर भरत और शत्रुघ्न अपने नानाजी से आशीर्वाद लेकर अयोध्या आते हैं। भरत को मार्ग में नगरवासियों से तिरस्कार और महल में उदास वातावरण मिलता है। इससे वे चिन्तित होते हैं। मंथरा उन्हें माता कैकेयी के कक्ष में ले जाती है जहाँ उसने भरत की स्वागत आरती का प्रबन्ध कर रखा है। लेकिन कैकेयी वैधव्य रूप में हैं। भरत इसका कारण पूछते हैं। कैकेयी उन्हें उनके पिता राजा दशरथ के परलोक सिधारने का समाचार देती है। भरत के कन्धे से धनुष गिर पड़ता है। कैकेयी भरत को सांत्वना देने का प्रयास करती है। जब भरत को यह पता चलता है कि मृत्यु से पहले उनके पिता भैया राम को चौदह वर्ष के लिये वनवास भेज चुके हैं तो वो माता से इसका कारण पूछते हैं। कैकेयी उन्हें अपने दोनों वरदान के बारे में बताते हुए धूर्त वाणी से कहती है कि अब अयोध्या के साम्राज्य पर वो निष्कंटक राज्य कर सकता है। भरत अपनी माता कैकेयी के इस कृत्य पर क्रोधित होते हैं। वे कैकेयी का वध करना चाहते हैं लेकिन भैया राम का विचार कर ऐसा करने से रुक जाते हैं। फिर भी वे माता कैकेयी का सदैव के लिये परित्याग करने और भैया राम को वन से वापस लाने की घोषणा कर कक्ष से बाहर चले जाते हैं। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 27, 2023
38 min
रामायण - EP 20 - श्रवण कुमार प्रसंग। दशरथ की मृत्यु
मंत्री सुमन्त राजमहल में जाने से पहले महर्षि वशिष्ठ के आश्रम जाते हैं और उनसे राजमहल साथ चलने का निवेदन करते हैं। वस्तुतः जाते समय राजा दशरथ ने सुमन्त से कहा था कि वो राम को वन में दो चार दिन रहने के बाद वापस ले आयें। राम न आयें तो कम से कम सीता को अवश्य वापस ले आयें। लेकिन सुमन्त इस कार्य में विफल रहते हैं। सुमन्त का विचार है कि यदि महर्षि वशिष्ठ साथ होंगे तो वे अपने वचनों से स्थिति संभाल लेंगे। दशरथ सुमन्त को राम सीता के बिना देखकर व्याकुल होते हैं। महर्षि वशिष्ठ उन्हें नीतिज्ञान देते हैं। रानी कैकयी के महल में मंथरा सुमन्त के अकेले वापस आने का समाचार पहुँचाती है। कैकयी उससे दशरथ की स्थिति के बारे में पूछती है। बिस्तर पड़े दशरथ को अपना अन्त समय निकट जान पड़ता है। उन्हें कुछ भी दिखना बन्द हो जाता है, तब उन्हें श्रवण कुमार के अंध माता पिता द्वारा दिया गया श्राप स्मरण आता है। दशरथ अपनी युवावस्था में आवाज की दिशा में निशाना लगाने में निपुण थे। एक बार आखेट के दौरान वे झाड़ियों में छिपकर सरयू नदी में किसी जंगली जानवर के पानी पीने आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी उन्हें पानी में हलचल की आवाज सुनायी पड़ी। उन्होने शब्दभेदी बाण चलाया जो लक्ष्य पर लगा। किन्तु किसी मानव की चीत्कार सुनकर वे भाग कर वहाँ गये और एक युवक के सीने पर अपना बाण लगा पाया। यह युवक कोई और नहीं, अपने अंध माता पिता को तीर्थयात्रा कराने निकला श्रवण कुमार था। प्राण निकलने से पहले श्रवण कुमार दशरथ से प्रार्थना करता है कि उसके माता पिता प्यासे हैं। वे उन्हें जल अवश्य पिला दें। दशरथ कलश में जल लेकर श्रवण कुमार के अंध माता पिता के पास जाते हैं। वे पश्चाताप में डूबे हुए हैं। दशरथ के हाथों से कलश लेते समय हाथ का स्पर्श होने से अंधा पिता समझ जाता है कि आगन्तुक उसका पुत्र नहीं है। दशरथ उन्हें श्रवण की मृत्यु के बारे में बताते हैं। पुत्र के मौत का समाचार सुन उसकी माता बिना पानी पिये प्राण त्याग देती हैं। अंध पिता भी अपने प्राण त्यागने का निर्णय लेता है किन्तु मरने से पहले दशरथ को श्राप देता है कि वो भी उनकी तरह पुत्र वियोग में तड़प तड़प कर मरेंगे। इस पुरानी बात को स्मरण करते हुए दशरथ धरती पर गिर पड़ते हैं और राम राम कहते हुए अपने प्राण त्याग देते हैं। उधर पर्णकुटी में राम को ध्यान योग के दौरान पिता का रथ आकाश मार्ग से जाने का अहसास होता है। रामायण एक भारतीय टेलीविजन श्रृंखला है जो इसी नाम के प्राचीन भारतीय संस्कृत महाकाव्य पर आधारित है। यह श्रृंखला मूल रूप से 1987 और 1988 के बीच दूरदर्शन पर प्रसारित हुई थी। इस श्रृंखला के निर्माण, लेखन और निर्देशन का श्रेय श्री रामानंद सागर को जाता है। यह श्रृंखला मुख्य रूप से वाल्मीकि रचित 'रामायण' और तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' पर आधारित है। इस धारावाहिक को रिकॉर्ड 82 प्रतिशत दर्शकों ने देखा था, जो किसी भी भारतीय टेलीविजन श्रृंखला के लिए एक कीर्तिमान है। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 26, 2023
35 min
Ramayan EP 19 - श्रीराम-वाल्मीकि संवाद
भक्त को भगवान से और जिज्ञासु को ज्ञान से जोड़ने वाला एक अनोखा अनुभव। तिलक प्रस्तुत करते हैं दिव्य भूमि भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थानों के अलौकिक दर्शन। दिव्य स्थलों की तीर्थ यात्रा और संपूर्ण भागवत दर्शन का आनंद। दर्शन दो भगवान! Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 20, 2023
34 min
रामायण - EP 18 - केवट का प्रेम और श्री राम का गंगा पार जाना
वनपथ गमन पर राम अपने मित्र निषादराज गुह के साथ गंगा तीरे पहुचते हैं। उन्हें पार जाना है। निषादराज एक केवट को बुलाते हैं लेकिन केवट राम जी को नाव पर बैठाने से इनकार कर देता है। उसने राम के चरणों की महिमा सुन रखी है कि किस प्रकार उनके चरण पड़ने से अहिल्या शिला से नारी बन गयीं थी। केवट को भय है कि राम के चरण पड़ते ही उसकी नाव भी स्त्री बन जायेगी और उसकी आजीविका का साधन जाता रहेगा। वो राम से कहता है कि पहले वो उनके चरण अच्छे से धोएगा और फिर उस पानी को पीकर जाचेगा कि उसमें कोई जादूटोना तो नहीं है। वस्तुतः केवट राम के परमेश्वर स्वरूप को पहचान चुका है और वो किसी बहाने से उनके चरणामृत का पान करना चाहता है। राम उसकी भक्ति को समझ जाते हैं और भक्त की बात मान जाते हैं। परात में गंगाजल से राम के पाँव धोने के बाद केवट उस जल को पीता है और ऐसा प्रकट करता है मानों अब वो सन्तुष्ट है कि राम चरणरज से उसकी नाव को कुछ नुकसान नहीं होगा। राम लक्ष्मण सीता और निषादराज नाव पर सवार होकर गंगापार उतरते हैं। राम के मन में संकोच है। उनके पास केवट को देने के लिये कुछ नहीं है। सीता पति के मन के भाव समझ लेती हैं और अपनी अंगूठी उतारकर राम को देती हैं। राम केवट को वो अंगूठी पार उतराई के रूप में देना चाहते हैं। लेकिन केवट भी बड़ा चतुर है। वो तो भगवान से इससे अधिक पाने की लालसा रखता है। वो मना करते हुए कहता है कि धोबी से धोबी धुलाई नहीं लेता है और नाई से नाई बाल कटाई नहीं लेता है तो वो केवट है और राम भी एक केवट हैं तो वो उनसे उतराई कैसे ले सकता है। केवट प्रभु राम के चरणों में गिर कर कहता है कि एक दिन वो उनके घाट पर आयेगा तब वे उसे भवसागर पार करा दें। यही उसकी उतराई होगी। गंगा मैया की अराधना करके राम, लक्ष्मण, सीता और निषादराज तीर्थराज प्रयाग में भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुँचते हैं। राम के वनवास से भारद्वाज मुनि व्यथित हैं। वे राम को अपने आश्रम रहने का आमन्त्रण देते हैं। राम जानते हैं कि अयोध्या प्रयागराज के समीप है। अतएव अयोध्यावासी कभी भी वहा आ सकते हैं। इसलिये वे भारद्वाज मुनि से कोई अन्य एकान्त स्थान पूछते हैं। मुनिवर उन्हें चित्रकूट जाने का परामर्श देते हैं। चित्रकूट एक अत्यन्त पावन स्थान है जहाँ यमुना पार करके जाना है और कोई नाव भी नहीं है। निषादराज और लक्ष्मण मिलकर बासों का एक बेड़ा तैयार करते हैं। राम यहाँ से भरत के समान प्रिय अपने मित्र निषादराज को वापस भेज देते हैं। निषादराज भारी मन से यह आदेश स्वीकार करते हैं। लक्ष्मण बेड़े को यमुनापार ले जाने के लिये खेते हैं। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 19, 2023
35 min
रामायण - EP 17 - राम का श्रंगवेरपुर पहुँचना। निषादराज से मिलन। सुमन्त का लौटना।
तमसा नदी के तट पर राम सीता और अयोध्यावासी रात्रि विश्राम करते हैं। राम सूर्योदय से पहले उठते हैं और प्रजा को सोता छोड़कर चुपचाप यह स्थान छोड़ने का निर्णय लेते हैं। वे सुमन्त के साथ रथ पर सवार होकर श्रंगवेरपुर पहुँचते हैं जो निषादराज गुह का राज्य है। निषादराज राम के मित्र हैं। एक सैनिक निषादराज को राम के रथ के राज्य सीमा में प्रवेश की सूचना देता है। निषादराज बंधु बांधवों के साथ उनसे मिलते हैं। वो राम को तपस्वी वेश में देखकर अचम्भित है। वे कैकेयी की चाल समझ जाते हैं। उधर दशरथ अपने महल में पुत्र विरह में जल रहे हैं। उन्होने अन्न जल त्याग दिया है। निषादराज राम से अपने छोटे से वनप्रदेश श्रंगवेरपुर की सत्ता सम्भालने का अनुरोध करते हैं। राम इसे अस्वीकार करते हैं और वृक्ष के नीचे घासफूस के बिछौने पर रात्रि विश्राम करते हैं। लक्ष्मण माता सुमित्रा के आदेश का पालन करते हुए रात्रि प्रहरा देते हैं। सवेरे राम निषादराज से गंगा पार कराने के लिये नौका का प्रबन्ध करने का अनुरोध करते हैं। राम आर्य सुमन्त से वापस अयोध्या जाने, पिता दशरथ को सम्भालने और भरत के राज्याभिषेक की व्यवस्था करने का निवेदन करते हैं। सुमन्त राजा दशरथ की इच्छानुसार सीता को वापस अयोध्या भेजने का अनुरोध राम से करते हैं। सीता उन्हें अपने पत्नी धर्म का भान कराकर इनकार कर देती हैं। राम गंगा पार जाने का उद्धत होते हैं। लक्ष्मण उन्हें खड़ाऊ पहनाना चाहते हैं। लेकिन राम इसका भी त्याग कर देते हैं। लक्ष्मण भी बड़े भाई का अनुसरण करते हुए अपनी चरण पादुकाऐं उतार देते हैं। निषादराज कहते हैं कि वन के पथरीले मार्ग पर नंगे पाव चलना दुष्कर होगा। तब राम को स्मरण आता है कि बाल्यकाल में गुरू वशिष्ठ ने उन्हें अपने आश्रम में कठोर तप का प्रशिक्षण देकर वनवासी जीवन जीने के अनुकूल बना दिया था। राम समझ जाते हैं कि गुरू वशिष्ठ त्रिकालदर्शी हैं और सम्भवतः वे भाँप चुके थे कि भविष्य में क्या होने वाला है। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 18, 2023
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रामायण - EP 16 - श्रीराम-सीता-लक्ष्मण का वन गमन
जैसे सीता अपना पत्नी होने का धर्म निभाती हैं, उर्मिला भी लक्ष्मण संग जाने का हठ करती हैं। लेकिन लक्ष्मण उन्हें माता कौशल्या की सेवा के लिये अयोध्या में रूकने के लिये समझाते हैं और उससे वचन लेते हैं कि वो दिल में बसने वाली छवि के साथ उन्हें वन के लिये विदा करेंगी। लक्ष्मण जानते हैं कि इतिहास में उर्मिला का यह बलिदान अकथ ही रहने वाला है। प्रजा के बीच राम वनगमन के पीछे कैकेयी और भरत की मिलीभगत होने की चर्चा है। गुरूमाता द्वारा कैकेयी को समझाने का प्रयास भी विफल रहता है। वो कैकेयी को सौतेली माँ का पर्याय न बनने की सीख देती है लेकिन कैकेयी की बुद्धि नहीं बदलती। राम लक्ष्मण व सीता वनगमन के लिये पिता की आज्ञा लेने पहुँचते हैं। दशरथ राम से राजविद्रोह कर उनसे राज्य छीन लेने को कहते हैं। राम इसे नीतिविरूद्ध बताते हैं तो दशरथ मन्त्री सुमन्त को सारा राजकोष और सेना राम के साथ वन भेजने को कहते हैं। इस पर हस्तक्षेप करते हुए कैकेयी राम को तापस वेश में वन जाने को कहती है। मंथरा भगवा वस्त्र लाकर देती है। इससे आहत मंत्री सुमन्त भी विद्रोह की भाषा बोलते हैं। तब राम उन्हें शान्त करते हैं और कैकेयी के हाथों से मुनि वस्त्र ग्रहण करते हैं। कैकेयी सीता को भी तपस्वी वस्त्र देती हैं। तब महर्षि वशिष्ठ कैकेयी पर रूष्ट होकर आज्ञा देते हैं कि सीता वन में राजसी ठाठ के साथ रहेंगी क्योंकि वो राजा दशरथ के वचन से बंधी हुई नहीं हैं। तब सीता ससुर और गुरू से क्षमा मागते हुए अपना स्त्री धर्म निभाने की इच्छा प्रकट करती हैं। मंथरा सीता को भगवा वस्त्र पहनाने आती है और कुटिलतापूर्वक उनसे समस्त राजसी वस्त्र और आभूषण उतारने को कहती हैं लेकिन गुरूमाता आभूषण उतारने को अपशगुन बताती हैं और सीता को रोक देती हैं। सीता आभूषणों के साथ भगवा वस्त्र धारण करती हैं। राजा दशरथ सीता को जोगन वेश में देखकर विचलित हैं। वे बारम्बार उन्हें रोकते हैं। उनके पिता जनक को दिये अपने वचन की दुहाई देते हैं। स्थिति हाथ से निकलने की आशंका में कैकेयी राम से तत्काल राजमहल छोड़ने को कहती हैं। दशरथ पीछे से सुमन्त को भेजते हैं ताकि वो राम को रथ पर ले जायें और कुछ दिन वन में रहने के बाद समझाबुझा कर वापस ले आयें। राजमहल के बाहर उपस्थित जन समूह राजा दशरथ के विरूद्ध विद्रोह का नारा लगाता है। राम के समझाने पर प्रजा शान्त तो होती है लेकिन राम के रथ के पीछे पीछे वन को चल देती है। राम का रथ नगर से निकलता है। दशरथ राम राम पुकारते बाहर निकलते हैं और धरती पर गिर पड़ते हैं। वो कैकेयी का परित्याग करने का ऐलान करते हैं और भरत के राजा बनने पर उससे तर्पण का अधिकार छीन लेने की बात कहते हैं। राम वनगमन से हर किसी की आँख में आँसू है लेकिन राज महल में एक उर्मिला ही ऐसी है जो रो भी नहीं सकती। आखिर वो अपने पति को दिये वचन से बंधी है। उसका त्याग पूरी रामायण में अकथ ही रह गया है। नगर से बाहर तमसा नदी के निकट पहुँचने पर राम प्रजाजन से वापस लौटने का निर्देश देते हैं। प्रजा उनकी बात का पालन नहीं करती। Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Apr 17, 2023
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