
जीवन का आध्यात्मिक करण :- चार सिद्धांत :- १) ईश्वर में विश्वास ! २) गहरा ध्यान ! ३) समर्पण ( प्रभु आपकी ही इच्छा पूर्ण हो, ईश्वर से मार्गदर्शन की प्रार्थना करें ) ! ४) समस्या के बारे में चिंता छोड़ देना और मन को विश्राम देना ! चार सिद्धांत :- १) अपने लक्ष्य को अपने सामने सदा आलोकित रखो और इससे इसके सिवा न कुछ देखो ना किसी पर ध्यान दो ! २) घटनाएं जो हमारे साथ घटती है वह कुछ महत्व नहीं रखती , उसके द्वारा हम जो बन जाते हैं वह महत्व रखता है ! ३) प्रत्येक दिन,सब कुछ सवीकारों जैसे वह ईश्वर से आई हो ! ४) रात्रि होते ही सौंप दो सब कुछ वापस उसके ही हाथो में !
Apr 18, 2020
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इसी एक विचार पर मन को केंद्रित रखें ! केवल ईश्वर ! आप ही मेरे जीवन का ध्रुव तारा है, मैं आप ही में वास करती हूं, विचरण करती हूं, स्वास लेती हूं और अपना अस्तित्व रखती हूं ! मैं आप से प्रेम करने और आपकी सेवा करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहती !
Apr 18, 2020
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चेतना का प्रकाश ओर जाता है उसी ओर आलोक हो जाता है ! चेतना के प्रकाश की दो विशेषताएं हैं ! ii) वह पदार्थ का ज्ञान कराता है ! ii) वह उसे प्रिय बनाता है ! जब मानव अंतर्मुखी हो जाता है तो बाहरी पदार्थों की प्रियता चली जाती है ! उसके कारण वे मानव के मन पर अपने दृढ़ संस्कार नहीं छोड़ते ! इस प्रकार नया कर्म विपाक बनना बंद हो जाता है ! सदा आध्यात्मिक चिंतन करने से मनुष्य की पुरानी मानसिक ग्रंथिया खुल जाती हैं ! अब्बू से सुख के लिए इधर-उधर दौड़ना नहीं पड़ता उसे अपने विचारों में ही असीम आनंद मिलने लगता है ! अब अनेक प्रकार की सांसारिक चिंताएं किसी प्रकार की मानसिक अशांति उत्पन्न नहीं करती ! ऐसा व्यक्ति सदा समयावस्था में रहता है !
Apr 14, 2020
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मनुष्य की बुद्धिमानी इसी में है कि वह अपने जीवन का एक-एक क्षण आत्मा के कल्याण के लिए ही लगाएं । यह काम उसे स्वयं ही करना है और जब तक जीवन है । तब भी तक इसे किया जा सकता है मनुष्य को यह ख्याल करना चाहिए कि मैं कौन हूं ? किस लिए आया हूं और मेरा कर्तव्य क्या है ? मनुष्य को यह समझना चाहिए कि मैं ईश्वर का अऺश हुॅऺ और यह संसार की प्रकृति का कार्य है । मेरा संसार में आना ईश्वर को प्राप्त करने के लिए है, ना कि संसार के भोग भोगने के लिए !
Apr 11, 2020
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मानव के लिए सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि आत्मज्ञान या परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करना है ! इसके लिए मन, कर्म और वचन से भगवद् भक्ति एवं समर्पण परम आवश्यक है ! मन, वचन और कर्म से एक होने वाला व्यक्ति सदा ही परमेश्वर का प्रिय होता है तथा परस्पर व्यवहार में सभी से समादृत भी होता है !
Apr 3, 2020
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हे शंभू ! हे सर्वसाक्षी प्रभु ! आप ही मेरी आत्मा है, पार्वती मेरी बुद्धि है, आपके साथ विचरण करने वाले गण आदि मेरे प्राण हैं, मेरा शरीर आपके निवास का मंदिर है ! मैं जिन-जिन इंद्रियों से जिन-जिन विषयों का उपयोग करती हूं, वह सब आपकी पूजा रचना है ! मेरी नींद समाधि-अवस्था है ! मैं पैरों से जहां कहीं भी चलती फिरती हूं, वह आपकी परिक्रमा ही है! मेरे मुख से निकलने वाली वाणी आपकी स्तुतियां है ! हे महादेव, मैं जो-जो भी कर्म करती हूं, वह सब कुछ, वे सब क्रियाएं आपकी आराधना है !
Apr 3, 2020
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गुरु सबमें सर्व व्यापक है, गुरु बारंबार शिष्य के अंदर अपने को प्रकट करता है, उसके भाव के अनुरूप, गुरु आपकी अंतरात्मा में सबके साथ एक होकर रहता है, गुरु आज्ञा चक्र में रहता है उसके सम्मान के लिए ही हम माथे पर कुमकुम, विभूति लगाते हैं, गुरु बारंबार शिष्य के अंदर अपने को प्रकट करता है उसके भाव के अनुरूप, गुरु आपकी अंतरात्मा है घट-घटवासी है ! श्री गुरु कृपा जब उतरती है, कुंडलिनी जब जागृत होती है तब इस शक्ति के प्रभाव से मनुष्य नि: संकल्प होता चला जाता है, उसके भीतर का जगत भी मिट जाता है !
Mar 31, 2020
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जगत चिति भगवती से व्याप्त है, इस संसार का मूल चिति है, संसार की सहायक चिति है, संसार चिति में ही व्याप्त है । चिति वह है जिसे परम शिव परमात्मा कहा जाता है, जो विश्वास है, पूर्ण है, निर्गुण है, सर्वधार हैं "अहम् ब्रह्मास्मि" का परम आधार है, जो जिंदात्मा है, चिति उससे भिन्न नहीं है, यह परम शिव की तन्मय अभिन्न पराशक्ति है जिसको "शिवशक्ति" भी कहा जाता है । संसार में मनुष्य देह धारण करके परमेश्वर ही रहता है, आप में श्री गुरु प्रसाद रूप में जागी हुई चिति- कुंडलिनी परमकुशलता से आपकी यात्रा पूर्ण करेंगी, यह ध्यान योग संसार में परमार्थ पथ-प्रदर्शक महायोग है, आप चिति के प्रसाद से महान बनेंगे, आपका संसार योगमय बनेगा,रसवान, बलवान, बनेगा, आपका घर बनेगा काशी, व्यवहार बनेगा नित्य-प्रेम, आपके साथी बनेंगे देवी-देवता, भोजन बनेगा नैवेद्य, सर्व कर्म परमात्मा- पूजा बनेंगे, ऐसा होते-होते आपका अंतिम फल-चिति में ही पूर्ण हो जाना आपको प्राप्त होगा। सिद्धयोग, कुंडलिनी, महापूजा ध्यान योग आपकी एक आत्माकृति है, जिस कृति में आप ही पूर्णरूप से व्याप्त कर, ध्यान-साधन को पूर्ण करके अपना स्वरूप स्थान प्रदान करती है । रोज तीन बार ध्यान करना चाहिए प्रातः काल 3:00 बजे, दोपहर को 11:00 बजे, साय: काल को 7:00 से 9:00 बजे तक । जय बाबाजी ।
Mar 31, 2020
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