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हिंदी को व्यावसायिक स्तर पर वो जगह नहीं मिल पाई, जो मिलनी चाहिए...ऐसी दुहाई न देकर, हिंंदी को कैसे गले लगाएं! ये सोचना है। क्षेत्राीय भाषाओ में भी लागू होती है, ये बात।
हिंदी को व्यावसायिक स्तर पर वो जगह नहीं मिल पाई, जो मिलनी चाहिए...ऐसी दुहाई न देकर, हिंंदी को कैसे गले लगाएं! ये सोचना है। क्षेत्राीय भाषाओ में भी लागू होती है, ये बात।