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कभी इन्तज़ार..कभी इन्कार..ये कैसी भ्रांति है।ये कैसा सरूर है।सपनों के पंखों ने,अपने आँखों से,उड़ती खामोशयों भरेआकाश को पढ़ लिया था।मेरी कविता अपने,सुर्खावी चेहरे के,लकीरों भरे भावों से..सुन्दर उपमाओं से...रात-भर श्रृंगार करती रही।शब्दों की दूरीयांपल-पल केछन्दों की छम-छम छमाहट से,लफ़्ज़ों की, खन-खन खनाहट सेनिरन्तर सजती रही।सूरों की शहनाई,रात भर बजती रही।निरन्तर... निरन्तर...कभी सोचा न था,मैं कवि बन जाउंगा....तुम्हारे लिए।श्रृष्टि के पन्नों केत्रियामी चेहरे कोतुम्हारे श्रृजनात्मक अनजाने स्पर्श कोकभी इन्तज़ार..कभी इन्कार..भरे भावों में तुम्हेंअपने खालीपन से, भर जाऊंगा।-राजीव

