राजीव
राजीव
RAJIV KUMAR SINHA
तुम्हारे शब्द
2 minutes Posted Jan 19, 2021 at 1:22 am.
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कभी इन्तज़ार..
कभी इन्कार..
ये कैसी भ्रांति है।
ये कैसा सरूर है।
सपनों के पंखों ने,
अपने आँखों से,
उड़ती खामोशयों भरे
आकाश को पढ़ लिया था।
मेरी कविता अपने,
सुर्खावी चेहरे के,
लकीरों भरे भावों से..
सुन्दर उपमाओं से...
रात-भर श्रृंगार करती रही।
शब्दों की दूरीयां
पल-पल के
छन्दों की
छम-छम छमाहट से,
लफ़्ज़ों की,
खन-खन खनाहट से
निरन्तर सजती रही।
सूरों की शहनाई,
रात भर बजती रही।
निरन्तर... निरन्तर...
कभी सोचा न था,
मैं कवि बन जाउंगा....
तुम्हारे लिए।
श्रृष्टि के पन्नों के
त्रियामी चेहरे को
तुम्हारे श्रृजनात्मक
अनजाने स्पर्श को
कभी इन्तज़ार..
कभी इन्कार..
भरे भावों में तुम्हें
अपने खालीपन से,
भर जाऊंगा।-राजीव